पिछड़ा वर्ग आंदोलन - Backward Class Movement in India

परिचय

इससे पहले की हम पिछड़ा वर्ग आंदोलन का विश्लेषण करें, हमें ये जानना होगा कि पिछड़ा वर्ग कौन है? 1925 में मुम्बई सरकार द्वारा ब्राह्मण, प्रभु, मारवाड़ी, पारसी, बनिया तथा ईसाइयों को छोड़ कर अन्य सभी जातियों को पिछड़ा वर्ग माना गया था । 1930 में स्टार्ट कमिटी द्वारा पिछड़े वर्गों को तीन भागों में बांटा गया ।

  • दलित वर्ग
  • आदिवासी एवं जंगली जातियाँ
  • अन्य पिछड़ा वर्ग

हिन्दू बैकवर्ड क्लासेज लीग द्वारा 100 + 15 की सूचि प्रस्तुत की गयी । ये सभी जातियाँ अद्विज (Non-Twice-born) थीं । इन्हे पिछड़ा वर्ग मन गया । हृदय नारायण कुंजरू ने पिछड़े वर्ग को अनुसूचित जाति का पर्याय माना तथा पिछड़ा वर्ग के स्थान पर दलित शब्द के प्रयोग पर बल दिया । टी. चेन्नया ने मैसूर का उदाहरण देते हुए ब्राह्मणो को छोड़ कर अन्य सभी जातियों को पिछड़ा वर्ग माना । के. एम. मुंशी मुम्बई के सभी अस्पृस्य तथा स्पृस्य जातियों को जो सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े थे उन्हें पिछड़ा वर्ग माना। आजादी के बाद पिछड़े वर्ग के निर्धारण का कार्य संविधान के अनुसार राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया।


कुल मिला कर पिछड़ा वर्ग समाज के दबे हुए वे लोग हैं जो विभिन्न प्रकार की निर्योग्यताओ से ग्रसित हैं । जिन्हे सामाजिक एवं आर्थिक से इस सीमा तक वंचित कर दिया गया है की उनकी राजनैतिक चेतना और मनोवृत्तियां कुंठित हो गयी हैं । इस तरह के प्रताड़ित लोग स्वयं की प्रतिष्ठा सम्मान और प्रस्थिति को प्राप्त करने के लिए, अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष एवं आंदोलन का सहारा लेते हैं ।


कुछ निश्चित प्रकार के बाह्य प्रभावों के कारण आज पिछड़े वर्ग के लोगो में कुछ ऐसी दशाए उत्पन्न हुए हैं जिनके कारण उनमे जागरूकता का श्रीजन हो रहा है। लोच. सभरवाल, चौहान आदि के अध्ययनों चलता है कि पिछड़े वर्गों में जागरूकता लाने का श्रेय ईसाई मिसनरी को जाता है। इन मिशनरियों के द्वारा अनेक प्रकार की योजनाओं के अतिरिक्त उन्हें अंग्रेजी शिक्षा प्रदान करना, समाज कल्याण के कार्यक्रमो को लागू करना, उनमें पद और मर्यादा के प्रति जागरूकता लेन का कार्य किया।

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